अचल श्रद्धा के प्रतीक - भगवान अचलेश्वर महादेव


ग्वालियर नगरी यूँ तो अपने सर्व धर्म समभाव के लिये विख्यात है, लेकिन यहाँ शैव सम्प्रदाय के अनुयायीयों का बाहुल्य है, अथवा यह कहें कि यहाँ महादेव के अचेक प्रचीन समय से है जिसका प्रमाण यहाँ के मंदिर हैं बैष्णव एवं शक्त आराधकों के देवालयों की स्थापना अर्वाचीन है जबकि शिवालय प्राचीन काल के है। गुप्तेश्वर महादेव, मंगलनाथ, हजारेश्वर, प्राचीन शिवालय हैं कोटेश्वर, भूतेश्वर, मारकन्डेश्वर की स्थापना भी प्राचीन है लेकिन उन सभी मंदिरों से प्राचीन स्वयंभू शिव मंदिर भगवान श्री अचलनाथ महादेव का है। जिनकी प्राकट्य की कहानी तो ज्ञात है लेकिन इनकी स्थापना की तिथि ज्ञात नहीं है, अतः यह निर्विवाद तथ्य है कि भगवान अचलनाथ इस अचेल के सर्वाधिक प्राचीन महादेव हैं।

श्री अचलनाथ का स्वयंभू शिवलिंग लश्कर शहर के प्राचीन राजमार्ग पर वर्तमान सनातन धर्म मंदिर मार्ग पर स्थित है। इनके प्राक्ट्य की अनेक किवंदतियाँ हैं। राजमार्ग के बीच भगवान अचलनाथ का शिवलिंग एक कच्चे मिट्टी के चबूतरे पर स्थित था उस जमाने में यह क्षेत्र वीरान वन्य क्षेत्र था, ग्वालियर शहर के रूप में किले के उत्तरी भाग की बस्ती थी जो वर्तमान में उपनगर ग्वालियर कहलाता है। मुगलों के पराजय के बाद अंग्रजी हुकूमत के दौर में यहाँ शिन्दे राजपरिवार सत्ता में आया। इनके संस्थापक श्रीमंत महाद्जी राव सिंधिया के नात से जाने गये। सिंधिया शासको में पहिले दक्षिणी क्षेत्र में कम्पू में कमलाराजा महाविद्यालय बाला महल बनाया फिर गोरखी महल बना। सिंधिया राजवंश के सबसे प्रतापी शासक श्रीमंत माधव राव सिंधिया (प्रथम) जो माधौ महाराज के नाम से विख्यात हुये इनके द्वारा आधुनिक ग्वालियर की स्थापना की गई। इन्होंने गोरखी महल के बजाय पूर्वी भाग में विशाल महल बनाना प्रारम्भ किया उसी दौर में बये जय बिलास महल को शहर से जोड़ने के लिये राज मार्ग का निर्माण हुआ - यह राजमार्ग, वहीं से निकला जहाँ भगवान अचलनाथ विराजे थे। कच्चे चबूतरे पर स्थित छोटे से शिवलिंग को महत्वपूर्ण न मानते हुये, राजमार्ग में वाधक बनने के कारण इसे हटाने का निणर्य लिया लेकिन, कहा जाता है कि जितना खोदते गये शिवलिंग उतना ही बढ़ता गया। अधिकारियों ने इसे लोहे की साँकल से बाँध कर हाथी द्वारा खींचकर बाहर करने का प्रयास किया किन्तु सफल न हो सके। इस बीच भगवान अचलनाथ ने महाराज को स्वप्न में कहा कि उन्हें अपने स्थान पर ही रहने दिया जाय। महाराज ने तुरंत इस आदेश का पालन करते हुए शिवलिंग को यथावत रखते हुये इसके चारों ओर चबूतरा बनाने का आदेश दिया। वैसे तो यह घटना किवदंती के रूप में प्रचलित थी, लेकिन इसको प्रमाणिकता स्वयं श्रीमंत राजमाता विजयाराजे सिंधिया जी ने अचलनाथ मंदिर पर ही दी। उन दिनों मैं श्री अचलेश्वर महादेव न्यास का सचिव था, हमने एक कार्यक्रम में श्रीमंत राजमाता साहिब को आमन्त्रित किया था। नटराज सभाग्रह में आयोजित इस कार्यक्रम में श्रीमंत राजमाता जी ने अपने उद्वोचन में अचलेश्वर महादेव का इतिहास बताते हुये कहा था कि विवाह के बाद जब श्रीमंत महाराजा जिवाजी राव सिंधिया जी के साथ वे नगर भ्रमण पर निकली तो प्रमुख मार्ग पर बने इस शिव - चबूतरे के संबंध में उन्होंने उत्कंठा प्रकट करते हुये इसका मार्ग पर बयने रहने का कारण जानना चाहा तब श्रीमंत जीवजीराव सिंधिया जी ने यही कहानी उन्हंे बताई थी।

भगवान अचलनाथ का चबूतरा काफी समय तक ऐसे ही रहा बाद में श्रद्धलुओं ने इस पर चार खम्बे बनाकर छोटे से मंदिर का रूप दे दिया। यहीं पर सड़क के किनारे पीपल का वृक्ष और एक कुआँ था, कुछ साधु संज और श्रद्धालु यहाँ नियमित आने लगे तब यहाँ पीपल के वृक्ष के नीचे श्री हनुमान जी की स्थापना की गई।

राहगीरों की सुविधा के लिये एक पक्की प्याऊ का निर्माण किया गया फिर क्रमशः यहाँ देवी माँ की स्थापना हुई फिर श्री राधा कृष्ण जी यहाँ विराजे श्रद्धालुओं ने मंदिर व्यवश्था के लिये समिति गठित की जो बाद में एक सार्वजनिक न्यास के रूप में पंजीकृत कराई गई। न्यास द्वारा भगवान अचलनाथ का वर्तमान शिखर युक्त मंदिर बनवाया, नटराज सभाग्रह का निर्माण कराया। भगवान श्री अचलनाथ की अहैतुकी कृपा से मुझे न्यास का अध्यक्ष अनने का सौभाग्य मिला उस काल में यहाँ वर्तमान श्री राम दरवार की स्थापना और इस पर राजस्थानी स्थापत्य का भव्य मंदिर बनाया गया। मंदिर में शिव-पार्वती के लाला सिद्धविनायक गणेशजी की भी स्थापना की गई। भगवान अचलनाथ के सामने नंदीश्वर को स्थापित किया गया। भगवान श्री अचलनाथ के मंदिर की इस महायात्रा में जहाँ एक ओर नगरवासियों और भोले के भक्तों का योगदान रहा वही कुछ निहित स्वार्थी तत्वों और प्रशासन से भी समिति को जूझना पड़ा।

अचलेश्वर महादेव का मंदिर आज ग्वालियर का प्रमुख मंदिर है। यहाँ न केवल शिवरात्रि और श्रावण पर मेला लगता है वरन् भव्य गणेश उत्सव, अनन्त चर्तुदशी पर विशाल गणेश विस्र्जन यात्रा, होली की रंग पंचमी पर भगवान अचलनाथ की नगर यात्रा, शरद महोत्सव पर खीर वितरण, दीपावली पर विशाल अन्नकूट आदि यहाँ के अन्य आयोजन है। कुछ वर्षों से यहाँ सर्वजातीय सामूहिक हजारों जरूरतमंद परिवारों के बेटे बेटियों के विवाह सम्पन्न कराये जा रहे है।

अचलेश्वर महादेव मंदिर परिसर में श्री रामदरवार को स्थापना का हमारा एक सपना था जिसे महादेव ने पूरा कराया, अब दूसरे चरण में भगवान अचलनाथ के वर्तमान मंदिर शिखर के स्थान पर विशाल 80 फीट ऊँचा शिखर बनाकर मंदिर कों भव्यमा प्रदान कराना है। भोलेनाथ की परम अनुकम्पा से यह योजना भी शीघ्र मूर्तरूप लेगी।

अचलेश्वर महादेव आज नगरवासियों की आस्था के केन्द्र बिन्दु है, गरीब और अमीर बच्चे बूढ़े, जाति-वर्ग, आदि भूलकर लाखों श्रद्धालु यहाँ अपनी कामनायें लेकर आते है, ओढरदानी भोलेबाबा मुक्त हस्त से उनकी कामनायंे पूरी करते। भगवान श्री अचलनाथ की ऐसी रही कृपा सदैव हम सब पर और महानगर पर बरसती रहे यही भोलेबाबा कके चरणारविन्द में प्रार्थना है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत् ।।

महेश मुदगल
पूर्व अध्यक्ष
(श्री अचलेश्वर महादेव न्यास)